Sunday, 12 November 2017

मैं दिल्ली हूँ मैंने कितनी, रंगीन बहारें देखी हैं।


मैं दिल्ली हूँ मैंने कितनी, रंगीन बहारें देखी हैं।
अपने आँगन में सपनों की, हर ओर कितारें देखीं हैं॥

मैंने बलशाली राजाओं के, ताज उतरते देखे हैं।
मैंने जीवन की गलियों से तूफ़ान गुज़रते देखे हैं॥

देखा है; कितनी बार जनम के, हाथों मरघट हार गया।
देखा है; कितनी बार पसीना, मानव का बेकार गया॥

मैंने उठते-गिरते देखीं, सोने-चाँदी की मीनारें।
मैंने हँसते-रोते देखीं, महलों की ऊँची दीवारें॥

गर्मी का ताप सहा मैंने, झेला अनगिनत बरसातों को।
मैंने गाते-गाते काटा जाड़े की ठंडी रातों को॥

पतझर से मेरा चमन न जाने, कितनी बार गया लूटा।
पर मैं ऐसी पटरानी हूँ, मुझसे सिंगार नहीं रूठा॥

आँखें खोली; देखा मैंने, मेरे खंडहर जगमगा गए।
हर बार लुटेरे आ-आकर, मेरी क़िस्मत को जगा गए ॥

मुझको सौ बार उजाड़ा है, सौ बार बसाया है मुझको।
अक्सर भूचालों ने आकर, हर बार सजाया है मुझको॥

यह हुआ कि वर्षों तक मेरी, हर रात रही काली-काली।
यह हुआ कि मेरे आँगन में, बरसी जी भर कर उजियाली।।

वर्षों मेरे चौराहों पर, घूमा है ज़ालिम सन्नाटा।
मुझको सौभाग्य मिला मैंने, दुनिया भर को कंचन बाँटा।।

जब चाहा मैंने तूफ़ानों के, अभिमानों को कुचल दिया।
हँसकर मुरझाई कलियों को, मैंने उपवन में बदल दिया।।

मुझ पर कितने संकट आए, आए सब रोकर चले गए।
युद्धों के बरसाती बादल, मेरे पग धोकर चले गए।।

कब मेरी नींव रखी किसने, यह तो मुझको भी याद नहीं।
पूँछू किससे; नाना-नानी, मेरा कोई आबाद नहीं।।

इतिहास बताएगा कैसे, वह मेरा नन्हा भाई है।
उसको इन्सानों की भाषा तक, मैंने स्वयं सिखाई है।।

हाँ, ग्रन्थ महाभारत थोड़ा, बचपन का हाल बताता है।
मेरे बचपन का इन्द्रप्रस्थ ही, नाम बताया जाता है।।

कहते हैं मुझे पांडवों ने ही, पहली बार बसाया था।
और उन्होंने इन्द्रपुरी से सुन्दर मुझे सजाया था।।

मेरी सुन्दरता के आगे सब, दुनिया पानी भरती थी।
सुनते हैं देश विदेशो पर, तब भी मैं शासन करती थी।।

किन्तु महाभारत से जो, हर ओर तबाही आई थी।
वह शायद मेरे घर में भी, कोई वीरानी लाई थी।।

बस उससे आगे सदियों तक, मेरा इतिहास नहीं मिलता।
मैं कितनी बार बसी-उजड़ी, इसका कुछ पता नहीं चलता।।

ईसा से सात सदी पीछे, फिर बन्द कहानी शुरू हुई।
आठवीं सदी के आते ही, भरपूर जवानी शुरू हुई।।

सचमुच तो राजा अनंगपाल ने फिरसे मुझे बसाया था।
मेरी शोभा के आगे तब, नन्दन-वन भी शरमाया था।।

मेरे पाँवों को यमुना ने, आंखों से मल-मल धोया था।
बादल ने मेरे होंठों को आ-आकर स्वयं भिगोया था।

रामावतार त्यागी

आखिर पाया तो क्या पाया?


मैं सोच रहा, सिर पर अपार
दिन, मास, वर्ष का धरे भार
पल, प्रतिपल का अंबार लगा
आखिर पाया तो क्या पाया?

जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा
औरों के स्वर में स्वर भर कर
अब तक गाया तो क्या गाया?

सब लुटा विश्व को रंक हुआ
रीता तब मेरा अंक हुआ
दाता से फिर याचक बनकर
कण-कण पाया तो क्या पाया?

जिस ओर उठी अंगुली जग की
उस ओर मुड़ी गति भी पग की
जग के अंचल से बंधा हुआ
खिंचता आया तो क्या आया?

जो वर्तमान ने उगल दिया
उसको भविष्य ने निगल लिया
है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु
जूठन खाया तो क्या खाया?

हरिशंकर परसाई

Tuesday, 29 March 2016

मार्ग मुर्दों को देना ही होगा।

सिसकियों और चीत्कारों से जितना भी हो आकाश भरा,
कंकालों क हो ढेर, खप्परों से चाहे हो पटी धरा

आशा के स्वर का भार, पवन को लेकिन, लेना ही होगा,
जीवित सपनों के लिए मार्ग मुर्दों को देना ही होगा।

Sunday, 27 March 2016

तू ब्रह्मन है ईस्वर , और तू ही है माया


अकेला  ही  आया  अकेला  जाऊंगा ,क्षणभंगुर  जीवन  को  मतलब  दे  जाऊंगा .
सोच  हर  वक़्त  बस  यह  रह  जाती  है , खून  से  जादा  गर्मी  तो  यह  दर्द  ले  आती  है ||

दुःख  है  अपना  सुख  है  पराया , दुःख  को  अपनाया  तो सम्  बन  पाया .
दुःख को  ही   शिक्षक  मैंने  अपनाया , सिखा  गया  मुझको  यह  जीवन  की  माया ||


आज  जो  क्षण  ह  कल  नहीं  रहेगा , किस  बात  का  गुरूर  है  , किस  ताकत  का  नशा  है
धरा  से  निकला  इसमें  ही  रमेगा , जब  समजा  इस  सच  को तब  ईस्वर  तेरे  करीब  मई  आया ||

मौत  से  बड़ा  सच  क्या  कभी  है  पाया , जो  समजा  ये  गहराई , दुनिया  लगती  ह  माया ,
कर्मभूमि  है  रंगमंच  , सब  कलाकार  ह  इसमें , कला  को  जी  लु , यह तभी समझ पाया ||

लोग  आएंगे  लोग  जाएंगे , रह  जायेगा  तो  सिर्फ  बस  मेरी  द्रढ़  इक  साया
सम्-भाव  अपनाया  तब  ऊपर  बढ़ा  हु , न  सुख-दुःख  का  दर  ह , सब  उसको  ही  चढ़ाया ||

ईस्वर  दे  शक्ति  रंगमंच  को  निभा  लु  , तेरी  नज़र  में  एक  कोन  मई  बी  अपना  लु
इस  संसार  में  रह  जाऊ  बन  के  एक  माया ||

नाम  मेरा  भी   हो  जाये , कण सा  तुजमे  रह  जाऊ  ,ईस्वर  दे  शक्ति , खुद में बस समां ले
संसार  तो  क्षणिक है  , तू ब्रह्मन है ईस्वर , और तू ही है माया||

-aBy

Saturday, 26 March 2016

सोच कि शक्ति

सोच  कि  शक्ति  समझ   तू  मूरख 
सोच  कि  शक्ति समझ  तू  मूरख 
मिटटी  से  हीरा  तभी  तोह  बनेगा 


हीरे  कि  चमक  बी  मिटटी  थी  कभी 
तपी  सूरज  में  , दबी  वो  धरा  में 
लड़ी  वक़्त  से , उडी  हवा  में 
तब  जाके  फिर  बनी  हीरे  सी 
खुद  को  मिटटी  समज  जो  गया  तू 
कैसे  चमकेगा  हीरे  सा  दुनिया  में .


मेहनत जो  कर  गया  तू  बन्दे . 
तपिश  जो  सह  गया  तू  बन्दे 
मिटटी  से  हीरा  तू  ही  बनेगा 


सोच  कि  शक्ति  समझ   तू  मूरख 
सोच  कि  शक्ति  समझ  तू  मूरख 

मिटटी  जो  सोचे  गन्दगी  भी  बनजाये 
मिटटी  जो  सोचे  जिंदगी  भी  दिखलाये 
मिटटी जो  सोचे  ईश्वर  भी  दर्शाए 


सोच  कि  शक्ति समझ   तू  मूरख 
सोच  कि  शक्ति  समझ   तू  मूरख

पूरा आस्मां अभी बाकी है . (Motivational Poetry Series)

ज़िन्दगी की असली उड़ान अभी बाकी है
हमारे इरादो का इम्तिहान अभी बाकी है.

अभी तो नापी है कुछ मुट्ठी भर ज़मीन
सामने पूरा आस्मां अभी बाकी है . 

यहां तो बस इंसान ही इंसान बनते हैं (#Poetry Series)

१.
पल  पल  तरसे  थे  उस  पल  के  लिए ,
मगर  यह  पल  आया  भी  तो  कुछ  पल  के  लिए  ,
सोचा  था  उसे  ज़िन्दगी  का  एक  हसीं  पल  बना  लेंगे  ,
पर  वो  पल  रुका  भी  तो  बस  एक  पल  के  लिए


२.
हर  पल  पे  तेरा   ही  नाम  होगा ,
तेरे  हर  कदम  पे  दुनिआ  का  सलाम  होगा
मुशिकिलो  का  सामना  हिम्मत  से  करना ,
देखना  एक  दिन  वक़्त  भी  तेरा  गुलाम  होगा



३.
कहीं   पर  धरम  बनते  हैं , कहीं  पर  इमां  बनते  हैं ,
कहीं  पर  हिन्दू ,सिख ,ईसाई
तो  कहीं  मुसलमान  बनते  हैं ,
हमारी  महफ़िल  मैं  आकर  देख  ऐ  "साकी "
यहां तो बस  इंसान  ही  इंसान बनते  हैं .


४.
नज़र  को  बदलो  तो  नज़ारे  बदल  जाते  है ,
सोच  को  बदलो  तो  सितारे  बदल  जाते  है ,
कश्तियाँ  बदलने  की  जरुरत  नहीं ,
दिशा  को  बदलो  तो  किनारे   बदल  जाते  है .


५ .
शाम  सूरज  को   ढालना  सिखाती   है ,
शमा  परवाने  को  जलना  सिखाती  है

गिरने  वाले  को  होती  तो  है  तकलीफ ,
पर  ठोकर  इंसान  को  चलना  सिखाती  है